Film Review: इक्कीस – शोर से दूर युद्ध की सच्चाई, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की खामोश ताकत, अगस्त्य नंदा की ईमानदार शुरुआत

सारांश

इक्कीस: एक अनोखी वॉर ड्रामा फिल्म की समीक्षा फिल्म इक्कीस, जो हाल ही में रिलीज़ हुई है, एक नई दिशा में युद्ध के अनुभव को प्रस्तुत करती है। यह फिल्म शोर, नारेबाजी और भव्य भाषणों से परे जाकर, युद्ध को एक मानवीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करती है। निर्देशक श्रीराम राघवन ने देशभक्ति को […]

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Jan 01, 2026, 10:45 AM IST

इक्कीस: एक अनोखी वॉर ड्रामा फिल्म की समीक्षा

फिल्म इक्कीस, जो हाल ही में रिलीज़ हुई है, एक नई दिशा में युद्ध के अनुभव को प्रस्तुत करती है। यह फिल्म शोर, नारेबाजी और भव्य भाषणों से परे जाकर, युद्ध को एक मानवीय दृष्टिकोण से देखने का प्रयास करती है। निर्देशक श्रीराम राघवन ने देशभक्ति को दिखावे में नहीं, बल्कि खामोशी, यादों और भावनाओं के माध्यम से दर्शाने की कोशिश की है। यह फिल्म केवल युद्ध जीतने की कहानी नहीं है, बल्कि उस कीमत की बात करती है जो इंसान को अपने फैसलों के लिए चुकानी पड़ती है। इस कारण से, इक्कीस की गति धीमी है, लेकिन इसका प्रभाव गहरा है।

कहानी की गहराई

इस फिल्म की कहानी सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की वास्तविक जीवन की घटनाओं पर आधारित है, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता बने। फिल्म दो टाइमलाइन में आगे बढ़ती है; पहली टाइमलाइन 1971 के बसंतर युद्ध की है, जिसमें 21 वर्षीय अरुण अपनी टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करता है। यहां युद्ध को रोमांचक या तमाशे की तरह नहीं, बल्कि डर, दबाव और अचानक मिली जिम्मेदारी के रूप में दर्शाया गया है।

दूसरी टाइमलाइन 2001 में सेट है, जहां युद्ध खत्म हो चुका है, लेकिन उसके निशान अब भी जीवित हैं। यह हिस्सा फिल्म को भावनात्मक गहराई प्रदान करता है और इसे केवल एक वॉर फिल्म से अधिक बनाता है। युद्ध की कहानियों में अक्सर नाटकीयता होती है, लेकिन इक्कीस ने इन सबको छोड़कर मानवीय पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया है।

अभिनय की उत्कृष्टता

फिल्म में अगस्त्य नंदा ने अपने डेब्यू में ही शानदार प्रदर्शन किया है। वह अरुण को एक सुपरहीरो के रूप में नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और आदर्शवादी युवा अधिकारी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी बहादुरी भाषणों में नहीं, बल्कि उनके निर्णयों में स्पष्ट दिखाई देती है। जयदीप अहलावत ने अपने किरदार में गहराई और स्थिरता लाते हुए शानदार परफॉर्मेंस दी है। उनकी उपस्थिति हर सीन में अनुभव और वजन को जोड़ती है।

फिल्म में धर्मेंद्र की उपस्थिति भी खास है। वह एक ऐसे पिता के रूप में नजर आते हैं जो कम बोलते हैं, लेकिन उनकी खामोशी में गर्व और दर्द छिपा होता है। उनकी परफॉर्मेंस फिल्म को भावनात्मक मजबूती प्रदान करती है। इसके अलावा, सिमर भाटिया का किरदार भले ही छोटा हो, लेकिन वह कहानी में एक महत्वपूर्ण भावनात्मक संतुलन लाती हैं।

डायरेक्शन और तकनीकी पहलू

श्रीराम राघवन का निर्देशन इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उन्होंने युद्ध को भव्य तमाशा नहीं बनाया, बल्कि उसके मानसिक और भावनात्मक प्रभावों पर ध्यान केंद्रित किया है। फिल्म के कई क्षणों में खामोशी संवादों से अधिक प्रभावी है। टैंक युद्ध के दृश्य, साउंड डिजाइन और वीएफएक्स यथार्थवादी हैं और कहानी के अनुरूप हैं। कैमरा वर्क और एडिटिंग फिल्म की गंभीरता को बनाए रखने में मदद करती है।

हालांकि, फिल्म की गति कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है। कुछ स्थानों पर कहानी को और भी कसाव की आवश्यकता होती है, खासकर दूसरे हाफ में। म्यूजिक बैकग्राउंड स्कोर सीमित लेकिन प्रभावी है। म्यूजिक कभी भी सीन पर हावी नहीं होता, बल्कि भावनाओं को सपोर्ट करता है। कई महत्वपूर्ण क्षणों में सन्नाटा ही सबसे बड़ा प्रभाव छोड़ता है।

फाइनल वर्डिक्ट

इक्कीस एक संवेदनशील और गंभीर वॉर ड्रामा फिल्म है, जो युद्ध को ग्लैमर में नहीं बदलती, बल्कि उसके मानवीय प्रभाव को सामने लाती है। मजबूत अभिनय, सधे हुए निर्देशन और ईमानदार ट्रीटमेंट इसकी प्रमुख ताकत हैं। हालांकि, इसकी धीमी रफ्तार इसे कुछ सीमाएं भी देती हैं। यदि आप शोर से दूर और भावनात्मक गहराई वाली फिल्मों के शौकीन हैं, तो इक्कीस एक बार अवश्य देखी जानी चाहिए।

इस फिल्म ने न केवल युद्ध के अनुभव को प्रस्तुत किया है, बल्कि यह दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करती है कि युद्ध की वास्तविकता क्या होती है। यदि आप एक सोचने वाली फिल्म के प्रेमी हैं, तो इक्कीस आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प हो सकती है।

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